Nomad’s Diary : खेती का प्रथम दिन – दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़

ये फोटो हैं सन् 2007 की जब दो वर्षों की सैकड़ों छोटी-छोटी मीटिंगों के बाद दो-चार गांवों के अादिवासी बंधु तैयार हुये खेती करने के लिये। साधुवाद नारायणपुर जिले में स्थापित रामकृष्ण मिशन के साथियों का जिन्होनें अपने कृषि फार्म्स में अादिवासी भाईयों को खेती करने के प्रारंभिक गुर सिखाये वह भी निःशुल्क। रुकने, खाने पीने तथा लिख पढ़ी वाले सामान का भी कोई शुल्क नहीं लिया।

जो अादिवासी भाई लोग कभी भी अपने जिले के बाहर नहीं गये थे उन्होनें खेती सीखने के लिये 250 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की नारायणपुर के रामकृष्ण मिशन के खेती फार्म्स में पहुंचने के लिये।

मेरे स्थानीय मित्रों की अगुवाई अौर मेरी सलाह की ट्रैक्टर से खेती करने ने मिट्टी की उर्वर क्षमता में नुकसान अौर फसल की लागत बढ़ जाती है, के बाद यह तय हुअा की खेती गायों-बैलों से की जायेगी। यहां यह बताना चाहूंगा कि बस्तर में गाय से दूध निकालने तथा गाय को घर में बांधकर रखने की परंपरा नहीं ही रही है। अादिवासी लोगों का मानना है कि गाय का दूध उसके बच्चे के लिये होता है।

हल चलाने के लिये बैल की जगह गाय का प्रयोग करना भी परंपरा में रहा है। 

अाज बहुत गांवों मे अादिवासी भाई लोग खेती करना शुरु कर चुके हैं अौर पिछले 6 वर्षों में बढ़ते बढ़ते 30 से अधिक गांवों में 100 से अधिक 2 से 5 एकड़ के कृषि केंद्र हैं जो कि अादिवासी परिवारों की ही अोनरशिप में चलते हैं।

   

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विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग

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