Corporate of Social Activism in India (first Draft in Hindi)

(यह लेख अभी अपूर्ण है, यह प्रस्तावना का पहला ड्राफ्ट है, अाप लोगो की सोच से, विचार से, काम करने के अनुभवों से यह एक बेहतर अौर परिष्कृत लेख बन पाये इसलिये यह बानगी अापको पेश है, मै स्वीकारता हूं कि इस लेख में अभी बहुत अधिक उठा पटक की जरुरत है-  विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग)

प्रस्तावना:

इसे भारत के वृहत्तर अाम समाज का दुर्भाग्य ही समझा जाये कि अब भारत में अान्दोलन भी प्रायोजित किये जाने लगे हैं, एक नया चलन (fashion) अान-लाइन अान्दोलनों अौर क्रान्तिकारिता का भी अा चुका है।  पिछले दो दशकों में प्रायोजित अान्दोलनों, खोखली क्रान्तिकारिता अौर प्रायोजित सामाजिक गतिविधियों का कार्पोरेट जगत उभर कर अाया है।  आईये कुछ मंथन करें इन्हीं मुद्दों पर अौर पता लगाने का प्रयास करें कि अाज वास्तव में हम खड़े कहाँ हैं।

जिस समाज ने कभी बुद्ध, महावीर अौर गांधी जैसे महापुरुषों का निर्माण कर दिया, जिस समयकाल में लोग जन-अान्दोलनों का तात्पर्य नही समझते थे उस समयकाल में इन लोगों ने स्वतःस्फूर्त जन अान्दोलनों को राज सत्ताअों के समानान्तर खड़ा कर दिया।  ये महापुरुष लोग ऐसा कर सके क्योंकि ये लोग जन अौर जन-अान्दोलनों का सही तात्पर्य समझते थे।  मैं नही समझता कि बुद्ध कुछ लोगो की भीड़ लेकर जाते थे राजाअों के पास अौर उनकी राजधानियों में किसी कोने में या किसी सड़क में तम्बू लगाकर अामरण अनशन का ड्रामा किया करते थे अौर प्रेस कान्फेरेन्सेस कर पाने के लिये जुगाड़ लगाते थे या रोज हल्ला मचाते थे कि राजा हिंसा बंद करो या जीवों पर दया करने का एक कानून बनाअो ताकि लोग कानून के डर के कारण दया अौर अहिंसा का पालन करें।  जिस समय Internet नही था; TV, Radio, Newspaper अौर यातायात के सुगमता भरे साधन नहीं थे; अंग्रेजी जैसी वैश्विक भाषायें नहीं थीं;  संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अंतराष्ट्रीय संधियां नहीं थी; डालर या पौण्ड जैसी वैश्विक मुद्रायें नहीं थीं जिनको कि स्थानीय मुद्राअों में परिवर्तित करके रहने, खाने व प्रेस कान्फेरेन्सेस का जुगाड़ किया जा सकता होता; उस समय की विषम परिस्थितियों में बुद्ध ने एशिया के बड़े भाग में एक वास्तविक जनान्दोलन खड़ा कर दिया था।  राजा लोग तो जन शक्ति के अागे झुकते चले गये थे जबकि उस समय लोकतंत्र नही था अौर राजा विवश नही होता था अपनी प्रजा के अागे झुकने के लिये।

मैं नही समझता कि गांधी जी लंदन की किसी सड़क में तम्बू लगाकर अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग किये थे या रोज किसी ना किसी प्रेस कान्फेरेन्स में बोलने या किसी रेडियो में साक्षात्कार देने का जुगाड़ लगाते थे। गांधी जी ने अपनी बातों को बहुत सारे लोगो तक पहुचाने के लिये अपने पन्ने खुद छापते थे अौर खुद ही बांटते थे। वह अपने छापेखाने का प्रयोग जन-संवाद के लिये करते थे, छापे खाने में पर्चे छाप कर अान्दोलन करने का दिखावा नही करते थे।  गांधी जी के असली फंडर देश का अाम समाज था दूर-दूर से लोग बहुत सारी समस्यायें झेलकर उनके पास अपना सर्वस्व अर्पित करने के लिये पहुंचते थे।  गांधी जी भारत की जनता की सामाजिक सत्ता के केंद्र थे अौर वह किसी जुगाड़ या तिकड़म से केंद्र नहीं बने थे, वह अाम समाज के अाम व्यक्ति की ह्रदय की धड़कनों तक पहुंचे थे, अाम समाज उनको अपना प्रतिनिधि मानता था; अौर इसमे कोई संशय नही कि गांधी जी ने खुद को जीवन मूल्यों की गहराईयों तक उतारने का प्रयास निरन्तर अौर जीवन पर्यन्त किया था।

बुद्ध हों या गांधी हों या इन जैसे कोई अन्य, सभी ने स्वयम् को कठोरता से परखा, सामाजिक समाधान की प्रतिबद्धता को अपने निजी अौर पारिवारिक हानि-लाभों से बहुत उपर रखा।  जीवन मूल्यों का पालन स्वयम् में कठोरता से करते थे, दूसरों को दिखाने के लिये या महानता के प्रमाणपत्र लेने के लिये या पुरस्कारों की दौड़ में अपनी अहर्ता सुनिश्चित करने के लिये या सत्ताअों से संसाधन प्राप्त करने के लिये या फंड प्राप्त करने के लिये जीवन मूल्यों का ढोंग नहीं रचते थे।

अाज भारत में कुछ ऐसे सतही अौर खोखले लोग मौजूद हैं जो कि दूसरों को गांधी होने या ना होने के प्रमाणपत्र बांटते हैं, अब जो दूसरों को गांधी होने का प्रमाणपत्र देते रहते हों वह खुद को क्या समझते होंगे इसका अन्दाजा सहज ही लगाया जा सकता है।  अाज तो ऐसे ऐसे सतही महापुरुष हमारे बीच मौजूद हैं जो कोका-कोला, पेप्सी अादि का विरोध करने के लिये पूरे देश में प्रेस कान्फेरेन्सेस अौर प्रायोजित अान्दोलनों का ढोंग करते घूमते हैं अौर उनके अपने बच्चे उन्हीं के सामने उन्हीं के पैसों से गटागट कोक व पेप्सी पीते हैं अौर ये पैसे भी इन महापुरुषों को सामाजिक कार्यों को करने के ही बदले वेतन या मानदेय या सामाजिक सहयोग के रूप मे मिलते हैं, वह बात अलग है कि इमानदारी का ढोंग करने के लिये अकाउंट्स की लिखा पढ़ी मे क्या क्या दिखाते हों।  जो लोग अमरीका को रोज गरियातें हैं, उनको लाखों-करोड़ों का फंड ही इस अाधार पर मिलता है कि ये लोग अमरीका को गाली देकर स्वयम् को प्रगतिशील सिद्ध करते हैं, इन्ही लोगों के बच्चे पिकनिक मनाने अौर गर्मियों की छुट्टियां मनाने अमरीका जाते हैं अौर स्वयम् भी ये लोग लगभग हर साल अमरीका किसी ना किसी सामाजिक अान्दोलन का ढोंग रच कर महीना- दो महीना अमरीका विचरण करके अाते हैं।  जैसे अामिर खान अपनी फिल्म को अास्कर दिलाने के लिये लॅाबिंग करने के लिये अमरीका जाते हैं वैसे ही भारत की सामाजिक क्रियाशीलता के ठेकेदार किस्म के कथित सामाजिक महापुरुष लोग विभिन्न पुरस्कारों की लॅाबिंग के लिये या बड़े फंड की लॅाबिंग के लिये किसी ना किसी बहाने से अमरीका जाते रहते हैं अौर अमरीका को गरियाते भी रहते हैं अौर अमरीका के ही लोगों से अमरीका को गरियाने के प्रायोजित अान्दोलनों को अायोजित करने के लिये फंड लाते हैं भले ही कागजी लिखा पढ़ी मे स्थानीय सामाजिक सहयोग दिखाया जाता हो। अब पता नही कौन सा स्थानीय समाज भारत मे है जिसके लिये अपने रोज की बड़ी बड़ी समस्याअों से अधिक महत्वपूर्ण अमरीका को गरियाने की प्रगतिशीलता समझना है।  वही लोग जो कि लाखों-करोड़ों रुपये हर साल प्रायोजित अान्दोलनों को खड़ा करने के लिये, मीडिया की सुर्खियों मे बने रहने के लिये खर्चते हैं अौर कागजी लिखा पढ़ी में इस धन का अागमन जन सहयोग दिखाते हैं जबकि इन्हीं लोगों को छोटे छोटे शिक्षा के केन्द्रों को चलाने के लिये एक चवन्नी भी अमरीका से मगांनी पड़ती है, स्थितियाँ तो यहा तक हैं कि इन लोगो के प्रायोजित अान्दोलनों मे हल्ला मचाने के लिये या शुरुवाती भीड़ के लोग इन्ही लोगों के वेतनभोगी लोग होते है जिनका वेतन भी भारत के बाहर से अाता है।  अब पता नहीं भारत का ऐसा कौन सा बेवकूफ समाज है जो कि अपने बच्चों के लिये चल रहे छोटे-छोटे शिक्षा केंद्रों जिनका कि खर्च लगभग नगण्य होता है का खर्चा नही उठाता जबकि जिन प्रायोजित अान्दोलनों से अाम समाज का कोई सीधा लेना देना नहीं होता उनके लिये लाखों-करोड़ों का इन्तजाम कर देता है।  यदि ऐसा समाज भारत के किसी कोने मे सच मे अस्तित्व में है तो सत् सत् नमन् ऐसे विशिष्ट बुद्धिजीवी समाज को जो कि लोगों को हर सप्ताह या महीना हवाई यात्रायें करने का, महंगे सभागारों मे अभिजात्यीय मीटिंग्स करने का, प्रेस कान्फेरेन्सेस करने का, महंगी कार्यशालाअों को करने का, महंगी रिपोर्ट्स छापने का अनाप सनाप खर्चा दे देता है किन्तु वास्तविक विकास के कार्यों के लिये सहयोग नहीं करता है।  भारत की कुल जनसंख्या का कितना प्रतिशत लोग वास्तव में इन मीटिंग्स का, इन रिपोर्ट्स का, इन कान्फेरेन्सेस का मतलब समझता है या खुद को इनका हिस्सा मानता है या इनके हवाई मुद्दों को स्वयम् से जुड़ा मानता है या अपने खुद के मुद्दे मानता है।  अाम अादमी को जबरदस्ती मुद्दे रटाये जाते हैं ताकि प्रायोजित अान्दोलनों
को जनान्दोलनों के रूप में परोसा जा सके ताकि थोड़ा हंगामा खड़ा किया जा सके, कुछ दिनों के लिये मीडिया की सुर्खियाँ बना जा सके अौर यदि जुगाड़ लग जाये सेटिंग बन जाये तो किसी पुरस्कार को ही हासिल कर लिया जाये या राजनैतिक सत्ता का ही भोग कर लिया जाये।

चलिये यदि मान भी लिया जाये कि इन कथित महापुरुषों को इनकी प्रायोजित चीजों को सहयोग देने वाला अाम समाज कहीं किसी कोने मे अदृश्य रूप में सच मे ही है तो इन कथित महापुरुषों की अपनी जिम्मेदारी क्या बनती है कि सामाजिक विश्वास अौर संसाधनों को वास्तविक अौर प्रोडक्टिव कार्यों में प्रयोग किया जाये या स्वयम् के अहंकारों के पोषण मे किया जाये।  कहीं से किसी भी  प्रकार के भोग का अवसर मिल जाये अब यही सामाजिक मूल्य हैं अौर जीवन मूल्य भी।

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